पहला हस्ताक्षर...

कुछ-कुछ पहले जैसा...no one forgets the firsts!!!

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

...तुम्हारे जाने के बाद



आज अचानक आत्मस्वीकृति के एक क्षण में मैं सोचता हूं कि क्या इस समाज के तमाम नैतिक और उपयोगितावादी मानदंडों के लिहाज से मैं एकदम आवारा और बेकार इंसान नहीं हूं...थोड़ी देर में एक अलसायी मादक आवाज में उत्तर आता है...हां हो...लेकिन मेरे लिए नहीं...
इस आवाज की शक्ल नहीं दिखती।
भीड़ की उदासी और एकांत घने जंगल की तरह सीमाहीन और डरावना है...उदासी के पंखों की उड़ान भी मन को नहीं भाती। कभी कभी कोई ख्याल मुझे इस उदासी के इस जंगल से हाईजैक कर ले जाता है...आमतौर पर वो या तो तुमसे जुड़ा होता है या मैं उसे तुमसे जोड़ना चाहता हूं। लेकिन इन दोनों में से किसी भी स्थिति के मुकम्मल ना हो पाने पर लिसलिसा, गीला, काला और भयावह...अकेलेपन का जंगल मुझे दबोच लेता है। जब भी तुम्हारे सोहबत का सुख पाने की मेरी उम्मीदें टूटती हैं, मैं दूसरों के लिए हिंसक, तुम्हारे लिए निष्क्रिय और खुद के लिए नकारात्मक हो जाता हूं। तुम कई बार कहती हो, तुम जो ध्यान करते थे, उसे अब क्यों नहीं करते...पढ़ते क्यों नहीं, या जो तुम्हें अच्छा लगता है, लिखना...लिखते क्यों नहीं.
यूं तुमसे बचने को आश्वासनों का जाल भले बुन देता हूं पर नहीं लिख पाता। विचार बनते हैं, और बिखर जाते हैं। मैं जानता हूं लगातार लिखने से व्यक्ति अच्छा लिखने लगता है। फिर मेरी संवेदनाओं की गीली मिट्टी में अल्फ़ाजों की शक्ल कई लोगों को जानी-पहचानी लगने लगती है, लोग आमतौर पर उससे प्यार करने लगते हैं...ये मुझे अच्छा भी लगता है...लेकिन इतना नहीं कि इसके लिए मैं रोज लिखने ही बैठ जाऊं...मुझे अकेलेपन के इस अवसाद से प्यार हो गया है...अलसाया हुआ अवसाद।
इस सवाल के जवाब में कई सारे ठोस जवाबों की श्रृंखला बन जाती है कि मैं तुमसे प्यार क्यों करता हूं। लेकिन मैं सोच रहा हूं कि तुम मुझे प्यार क्यों करती हो...ऐसा पहले भी कई बार सोच चुका हूं। लेकिन आज तक कभी कोई ठोस जवाब नहीं मिलता। अचानक लगता है कि मेरी सारी क्रियाएं अपने जीवन का व्यर्थ विस्तार सिमटते हुए देखने के आसपास संकुचित या फैली हुई हैं। मैं क्या ऐसा कर पाऊंगा जिससे किसी के जीवन के इस बने-बनाए क्रम में कोई बदलाव ला सकूं, कोई सुख पैदा कर सकूं...तुम्हारी-मेरी बदलाव लाने की ख्वाहिशें, दरअसल तो इसी कवायद का हिस्सा हैं ना कि खुद का नाम इतिहास की स्मृतियों के दस्तावेजों में हमेशा हमेशा के लिए सुरक्षित रह जाए...मेरे मन में अक्षय यश की ये कामना धुंधली हो चुकी है।
हां,  मैं जिंदगी की कुछ चीजों को अब भी सलीके से रखना चाहता हूं, लेकिन वो नितांत निजी है। निजी माने उनका होना ना होना मैं अपने जरिए ही चाहता हूं। क्या ऐसे हो जाने में और तुम्हारी तरह महात्वाकांक्षा के अरण्यों में तपस्या कर कुछ महान रचना करने में कोई बड़ा अंतर है...समय की गर्द से कोई कुछ साल आगे तक ही तो बच सकता है, नष्ट तो सभी को होना है। लेकिन सवाल सिर्फ ये नहीं है। जीवन का मौजूदा हिस्सा, विरोधाभासों की कुंडली मारे सांप की तरह मुझे घूरता रहता है, ज़रा बचने की कोशिश पर सारा ज़हर जिस्म में उतार देने की फुंफकार करता मेरे सीने पर बैठा रहता है...उसका फन मैं अपनी दो आंखों के ठीक बीचोंबीच महसूस करता हूं।
जाने ये किस खालीपन को भरने का जुनून है कि जनम-मरण के इस चक्कर से मुक्ति नहीं मिलती...फिर फिर जन्मता हूं...फिर फिर मरने के लिए...मैं किस प्रेम का भूखा हूं कि किसी की परिपाटियों पर ठीकठाक बैठ नहीं पाता...क्या तुम्हारी दरांती से संवरेगी मेरे मन की ये बेडौल कुंदा...
इन्हीं विरोधाभासी सवालों की जकड़न में जब दम घुटने लगता है तो तुम्हारी याद आती है...ऐसे, कि शायद किसी मरते हुए को जिंदगी याद आए...एक आह उठती है, तुम्हारा नर्म, नाजुक बदन याद आता है....आंखों के आगे धुंधलका छाने लगता है...चीड़ की गीली लकड़ियों का हवन...सुलगने लगता है...इश्क की खुशबू की मदहोशी में मैं फिर जिंदा हो उठता हूं...
तुम्हारी विलक्षणता तुम्हें सदियों तक जिंदा रखेगी...लेकिन मैं...मेरा कोई उपयोग नहीं है।

शनिवार, 26 नवम्बर 2011

वो गैरवाजिब, गैरजरूरी...लेकिन फिर भी...मौजूद तो है।

कुछ उनकी, जिन्हें पढ़ते, सुनते ज़हन की शाखों ने लोच खाना सीखा...



वो

-गुलज़ार.
जो शायर था चुप-सा रहता था
बहकी-बहकी-सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था गूँगी खामोशियों की आवाज़ें!
जमा करता था चाँद के साए
और गीली- सी नूर की बूँदें
रूखे-रूखे- से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था
वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब- सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था
चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है...

बृहस्पतिवार, 17 नवम्बर 2011

भ्रम भंग...

भ्रम भंग

तुम तब तक मेरा हिस्सा थी
मेरे ही अंतस का,
उठते-बैठते साथ रहा करती थी
मेरी होकर..
मुझमें ही रहती थी

साथ खाना, साथ पीना
सोना साथ
सपने भी देखना साथ...और बांटना सुबह उठकर उनको
बड़ा बुरा सपना देखा आज
तुम हाथ छुड़ाकर चली गयी हो..
और तुम्हारा हंसकर कहना
मेरे ही अंदर से,
ये तो अच्छा है...कहते हैं सपने में जाने वाले साथ रहा करते हैं

साथ थी तुम, जब तक तुम्हें अभिव्यक्त नहीं किया था मैंने
जब तक तुम्हें शक्ल नहीं दी थी
शब्दों में बुना नहीं था...
अल्फाजों में चुना नहीं था...
मन से बाहर लाकर, तन में गुना नहीं था...
अब तुम बाहर हो,
डायरी में लिखी मेरी किसी कविता की तरह...
बिस्तर पर बेजान पड़ी हो...

हां, तुम्हारे होने की तरह,
भ्रम था, झूठ था ये सपनों का बूझना वो..
क्योंकि सपने में जाने वाले,
कई बार,
सचमुच चले जाया करते हैं...

बुधवार, 16 नवम्बर 2011

कभी तो आएगा क़रार, खुद के अंधेरे में दफ़न, इस रूह को मेरी...

कभी तो आएगा क़रार...



(1)
मन्नतों की बुनियाद पर खड़ी,
बेपनाह ख्वाहिशों की ये जिंदगी
तुमने दी है...।
तुम, जो बेतरह खूबसूरत हो
और मजबूत भी।
इस दुनिया के जुल्म-ओ-सितम,
बर्दाश्त करने के लिए ही नहीं,
उसे अपने पैरों की ठोकर पर रखने लायक भी...
तुम्हारे ही तो दिए हुए हैं हौसले ये,
फासले ये।
तुम्हारी ही तो दी हुई है जिंदगी ये...
जो भी है,
जैसी है
खूबसूरत है...




(2)
तुमने जो कुछ भी कहा उस दिन...
ज़ख्मों-खराशों की तरह कायम है।
लेकिन दिल को तकलीफ नहीं देता..
क्योंकि
वो हक था तुम्हारा।
हां, अगर कुछ ज़ख्म से नासूर बन गया है,
तो वो है
तुम्हारी आखिरी आवाज...
जो रात भर गूंजती रही कानों में उस रोज
डू यू वांट मी, ऑर नॉट?
ये सवाल था,
आरजू थी,
या धमकीभरे लहजे में मांगा था कुछ तुमने...
ठीक-ठीक याद नहीं।
ये भी नहीं याद कि क्या जवाब दिया था मैंने...
क्योंकि तुम्हारे इस सवाल के बाद ही
खो गया था अपने अंदर छाए अंधेरे में कहीं,
गुमनाम अंधेरा,
जिसमें कुछ साफ नहीं नजर आता...
मैं क्या हूं, क्या करना चाहता हूं, क्या कर पाऊंगा।
शायद...ऐसे ही किसी मोड़ पर उस गुमनाम अंधेरे से
निकलेगी एक शक्ल
मौत की।
लेकिन उससे पहले,
बताना चाहता हूं, कि कोई ठीक-ठीक जवाब क्यों नहीं दे पाया मैं...
दरअसल,
तुम्हारी सवालिया आवाज को सुनते ही,
मेरे अंतर से निकला था जवाब...
जो तुम तक पहुंचने से पहले ही,
खो गया कहीं,
जेहन की पेंचदार नसों में छाए
उसी गुमनाम अंधेरे में...
गोया कि जवाब, सिर्फ जवाब नहीं था,
एक जिम्मेदारी थी...



(3)
तुम्हारी आवाज अब भी गूंज रही है कानों में,
और उसके पीछे भागता हूं मैं
उसे पकड़ कर अपने गले से लगा लेने की
कोशिश में,
लेकिन सिगरेट से उड़े
धुएं के छल्ले की तरह...
वो दूर कहीं गुम हो जाती है...मेरे जवाब की तलाश में।
एक अफसोस सा चटकता है जेहन में
और चुभ जाते हैं टुकड़े उसके
पूरे जिस्म में मेरे,
लेकिन खून नहीं निकलता...
क्योंकि आंसुओं के साथ ही
अब सूख चुका है लहू भी मेरा!




(4)
तुम्हें याद तो होगा,
मेन सड़क के किनारे, चीड़ के पेड़ों की दबंग चॉल से
थोड़ा बाएं होते हुए
करीब पचास फीट नीचे,
बांसों की वो बसाहट...
सुलगते इश्क के हवन की वो भीनी खुशबू ,
जिंदगी उसी बैंबू कॉटेज में कैद होकर रह गयी है
जिसमें तुम्हारे साथ आखिरी रात बितायी थी मैंने,
वो आखिरी रात
जिसमें जिंदा था मैं...

बृहस्पतिवार, 3 नवम्बर 2011

कफ़स

कफ़स
ए कुछ साल पहले,
तुमने उम्मीदों का,
जो चराग़ जलाया था.
आने वाले कल के कैनवस पर,
हमारी, अपनी साझा ज़िंदगी का,
जो कोलाज बनाया था,
वो कैनवस,
कफ़स बन गया है अब..

और झुलस गयी हैं उंगलियां मेरी,
हवाओं से हिफ़ाज़त करते,
तुम्हारी,
उम्मीदों के चराग़ की.

ऐसा नहीं कि उम्मीदें चटक गयीं मेरी
या पस्त हो गया हो हौसला,
पर तुम ही कहो ना,
आखिर,
हवाओं पर आशियाने बनाने का
तुम्हारा ख़्वाब,
मेरी आंखें कब तक देखें...

मंगलवार, 1 नवम्बर 2011

अंधा युग

अंधा युग
यदि झूठ बदलता रहता है,
चेहरे, वस्त्र और चाल...
तो सच का भी
यथार्थत:
कहां होता है कोई चरित्र?

दरअसल, सच तो बस बैल हो जाने में है
आचरण करने में,
क्योंकि कृष्ण ने आदेश दिया है
आचरण में ही तुम्हारे मनुष्य होने की सार्थकता है
तुम्हारी नियति बनेंगे
आज किए गए
तुम्हारे कर्म...
वही युगों-युगों तक बनेंगे
तुम्हारा भाग्य...
अर्जुन बैल बन गया
और एक युग छला गया कृष्ण के हाथों...

तुम भी,
पक्ष लो सत्य का
या असत्य का...आचरण या निष्क्रियता का...
छले जाओगे...

दुख के अंडे

दुख के अंडे

इन दिनों,
अपने दुखों को से रहा हूं,
से'ना तो समझते होंगे आप,
वही जो बतख करती है,
अपने अंडों के साथ,
घंटों बैठी रहती है उन पर,
अंडों में जिंदगी की,
आंच पैदा करने के लिए..
सेंकती है अपनी
जीवन-ऊर्जा से उनको...
इस सेने में ही शामिल होता है,
बतख का जीवन,
लगाव,
और करती है अपनी सुखद स्मृतियों का निर्माण वो,


ऐसे ही मैं भी से रहा हूं
सालों के सहेजे,
दुख अपने,
सेंक रहा हूं उनको
अपने ताप से,
देखना है,
जब इन दुखों के अंडे फूटते हैं,
तो,
उनमें से निकले बच्चों की
शक्ल,
किससे मिलती है...