पहला हस्ताक्षर...

कुछ-कुछ पहले जैसा...

बुधवार, 14 सितंबर 2011

सिलसिला शुरू हुआ...



रीब तीन साल पहले जब ब्लॉग बनाया था, तो सोचा था की रोज़ कुछ लिखा जायेगा, जिन अनगिनत कहानियों से हर रोज़ दो-चार होता हूँ, उनमें से रेशा-रेशा ही सही, कुछ हिस्सों में सबमें बांटूंगा...लेकिन समय के अभाव ने ऐसा करने नहीं दिया. मालूम होता है कि वो समय का अभाव नहीं था, सिर्फ आलस्य था. आज लगता है कि समय का अभाव तो कभी होता ही नहीं, सिर्फ उसका कु-प्रबंधन और इच्छा-शक्ति का अभाव होता है. सो आज तय करके बैठ गया कि लिखना ही है. एक मित्र ने फेसबुक पर लिखा- आज बहुत दिनों में कुछ लिखा, तो महसूस हुआ कि कई दिनों तक नेट-प्रैक्टिस न करे, तो कैसे गेंदबाज़ वाइड और नो-बाल फेंकता है....इसलिए पहले ब्लॉग से ही विकेट तो नहीं ले सकता, स्टंप के आस-पास ज़रूर फ़ेंकने की कोशिश रहेगी. 
आज संयोग से हिंदी दिवस भी है...तो क्यूँ न शुरुआत उसके शोक-गीत से ही की जाये. आईआईएमसी में ६ साल पहले इसे मंच से सुनाया था, ईनामी चेक तो नहीं मिला, तालियाँ ज़रूर हाथ आई थी...

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हिंदी दिवस- एक शोकगीत
एक छोटी सी बात कहनी है आप से,
छोटी सी, जो कुछ ही क्षणों में चुक जायेगी.
ठीक वैसे ही, जैसे एक ही दिन में,
चुक जाएगा यह हिंदी दिवस.

बेचारी हिंदी के लिए,
फिर आ जाएगी अंधेरी रात,
बीत जाएगी इस दिवस के 
संक्षिप्त-सीमित-पूर्वनियोजित उजाले की बात.

मैं निकला घर से आज, अलसुबह,
देखा सफ़ेद साडी के चीथड़ों में,
बमुश्किल लिपटी एक बुढिया
सुबक रही है.
कराहती उस आकृति के चारों ओर,
बना था तीव्र वेदना का एक वृत्त,
जो मुझे बरबस खींच ले गया उसकी ओर,

पूछा मैंने जाकर पास, अम्मा क्यूँ रोती हो.
क्या है ऐसी तकलीफ कोई,
जो बाँट सकूँ मैं अपिरिचित?
उसने मेरी ओर नज़र उठाये बगैर कहा,
बेटा छोड़ो यह संवेदनाएं, यथार्थ की राह लो,
कुछ नई नहीं है मेरी कहानी,
मैं हूँ तुम्हारी राष्ट्रभाषा,
बुढिया पुरानी.
हिंदी नाम है मेरा!!
जिसे उसके अपनों ने ही पराया कर दिया,
अंग्रेजी को ऐसे सर चढ़ाया,
कि मुझे अपने ही घर से बाहर कर दिया!

कहा तू अब किसी काम की नहीं है,
तुझमें अब न रोटी है न कमाई,
यही नहीं, अब तो तुझे बोलने में,
कोई शान भी नहीं है.
बड़े विद्वानों के लिए तुझमें,
विचारों का अन्वेषण भी संभव नहीं  है.

ज़रा अंग्रेजी को देख...नए-नए मौलिक विचार,
नित नयी अवधारणाए मानो फूट पड़ती हैं इससे,

फिर अंग्रेजी का तो एक स्टेटस है,
और तू?
तू तो मुरझाया हुआ एक कैक्टस है...
जिसे हिंदी दिवस का पानी पिला पिला कर,
साल भर जीवित रखा जाता है.

हिंदी कहती जा रही थी...
वो भूल गए अब, कि मैं,
भारतेंदुओं, निरालों कि जननी हूँ,
कभी मन-वचन-कर्म से अपनाते,
तो पाते,
कितने मौलिक विचारों की सर्जनी हूँ.
अरे वो तो वहां से भी दुत्कारे जायेंगे,
जब अँगरेज़ उनसे उनकी भाषा का प्रश्न पूछेंगे,
तो क्या मुह दिखायेंगे?
आवेश में फिर फूट पड़ी हिंदी.

मुझसे अब रहा न गया, और मैं
वहां से उठकर चल दिया.

शाम को वापस उसी जगह से गुज़र रहा था,
मैंने देखा, पोस्टरों और बैनरों के बीच,
उसी बुढिया को रेशमी साडी में,
मंच पर बिठाया गया है,
उसके चारों ओर लोग,
तरह-तरह के भाषणों में व्यस्त हैं,
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता,
किसी ने मेरा हाथ पकड़ा और हिलाते हुए बोला,
भाई, हैप्पी हिंदी डे!!!
मैं समझ गया,
मैं समझ गया कि फिर हिंदी-पुत्रों ने हिंदी को,
मूर्ख बनाया होगा,
ज़रूर फिर से हिंदी दिवस आया होगा.
ज़रूर फिर से हिंदी दिवस आया होगा....
   
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Image courtesy- artofamerica dot com

17 टिप्‍पणियां:

Puja Upadhyay ने कहा…

ओ पहाड़ों के शहजादे!
ब्लॉग की दुनिया में तुम्हारा स्वागत है...उम्मीद है यहाँ अनगिन रंग तुम भी बिखेरोगे...और हमें नयी आँखें मिलेंगी.

तुम्हारे किस्सों के रेशे से कैसा तो खूबसूरत दुशाला बुनता है की उसकी गर्मी से यादों की सर्द रात काटी जा सकती है.

ये हिंदी दिवस मुझे बहुत अच्छे से याद है...हम साथ ही तो बैठे थे...शशि की कविता भी याद है मुझे...क्या खूबसूरत दिन थे यार...वैसे कौन जीता ये याद नहीं :)

अनुराग ढांडा ने कहा…

शुक्र है, अल्फाज़ों के ज़रिए ही सही क्रांति की बू आ रही है.....आज़ाद होने की तरफ़ बढ़े इस पहले कदम पर शुभकामनाएं। बस अब लगे रहो.....

pallavi trivedi ने कहा…

स्वागत आपका ब्लॉग संसार में... बहुत शुभकामनाएं!

हस्तक्षेप ने कहा…

जल्दी का काम शैतान का, फिर शुक्ला कैसे करे इंसान का? जल्दबाजी में पोस्ट करने के चक्कर में कुछ अक्षम्य मात्रात्मक त्रुटियाँ रह गयीं, दरअसल, उसके लिए गूगल ज्यादा ज़िम्मेदार है. मसलन, "तुझमें न रोती न कमी" की जगह है "तुझमें रोटी न कमाई", इसके अलावा, "निरालों कि जननी हूँ" की जगह "निरालाओं की जननी हूँ" है. खैर, सभी ब्लॉगर बुद्धिजीवी हैं, ऐसा मानते हुए मैं असुविधा के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ.

हस्तक्षेप ने कहा…

@ puja upadhyay- क्या खूब टिप्पणी है. अच्छी कटेगी यहाँ तुम्हारे साथ :), अब देखो, कल सुबह ७ बजे की मजदूरी शिफ्ट है, लेकिन मन तुम लोगों को जवाब दिए बिना सोने का नहीं कर रहा. वैसे puji, हिंदी दिवस ही नहीं, और भी कई दिवस हैं जिनका ज़िक्र हो तो मस्ती का महापुराण बन जाये. लेकिन हाँ, इस blog को चालू करने का शुरूआती धक्का तुमने दिया है इसलिए श्रेय का बोझ भी तुम्हें ही उठाना होगा ;)

हस्तक्षेप ने कहा…

@anurag- शुक्रिया धंधा साब...आपको निराशा नहीं होगी. वैसे तुम्हारा नाम Dhandha लिखना तो चाहता हूँ लेकिन गूगल से जाने क्या दुश्मनी है ;)

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

पूजा की बज़ से खबर आयी कि कोई पहाडो का शहजादा आया है, जिसका स्वागत पान पसंद के साथ करना है फ़िर आपने पहली पोस्ट में ही मान भी लिया कि सभी ब्लॉगर बुद्धिजीवी हैं, इस खुशफ़हमी के नशे में झूमते हुये हम भी आपके किस्से, कहानियां पढने आ गये। लिखते रहें अपने हिस्से की भी कहानियां।

हस्तक्षेप ने कहा…

@pallavi- अनेकों धन्यवाद पल्लवी जी :) हौसलाफजाई के मायने आप सभी से ज्यादा कौन समझ सकता है...bas itni shubhkamnayen aur dijiye ki safar achcha kate!

हस्तक्षेप ने कहा…

@pankaj- पूजा के हाथ की बोहनी है, गड़बड़ कैसे हो जाएगी? ;), पंकज भाई, जड़ें मैदानों में ही हैं, और सच कहूँ तो इतनी गहरी हैं कि जीवन चाहे पूरा पहाड़ों पर बीते, लेकिन आखिरी साँसे allahabad में गंगा किनारे ही निकलें, ऐसी इच्छा मन में रहती है...हिमालय से दोस्ती kareeb 3 साल पुरानी है, लेकिन याराना अब इतना गहरा हो गया है कि हर २ महीने में एक बैठकी हो ही जाती है. बहुत कुछ है जिसे हमने ढूंढा ही नहीं अपने हिमालय में, और गुणगान करते हैं दुनिया का. बहरहाल, आप आते रहिएगा, उम्मीद है, निराश नहीं होंगे. आपको पहाड़ी भोजन भी कराएँगे, लोकगीत भी सुनायेंगे और पहाड़ का दुःख-दर्द भी मिलकर बांटेंगे :)

Abhishek Ojha ने कहा…

बिलेटेड हैप्पी हिंदी डे :)
उसी तर्ज पर स्वागत है 'बुद्धिजीवियों' की दुनिया में :P

रीतेश ने कहा…

बढ़िया है. सुना-सुना सा नहीं लग रहा है. बहुत दिन हो जाएं तो अपना हाथ भी पराया लगने लगता है.

abhi ने कहा…

आ गए जी हम भी..पूजा जी के रिकमेंडेसन पे अटेंडेंस लगाने...क्या शानदार लिखा है वैसे...पहली ही बौल पे छक्का ..वाह :P

Arvind Mishra ने कहा…

यही हमारा पाखण्ड है!

संजय भास्कर ने कहा…

हिंदी दिवस पर बढ़िया प्रस्तुति

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पुनः सृजन-क्षेत्र में स्वागत है, लेखन उपचार है मेरे लिये उन विकारों का जो अज्ञात हैं। बस लिखता जाता हूँ, एक पूर्वनियत सा आरोपित उपक्रम है।

कपिल शर्मा ने कहा…

शुक्लाजी बड़ी गहरी सोच है... खत भले ही जोया के नाम है, लेकिन संदेश तमाम दूसरों के लिए भी है। जोया को नाराज़गी हो सकती है, कि उसे लिखा खत सरेआम हो गया, मगर शुक्लाजी सोच बड़ी गहरी है। लगे रहो...

बेनामी ने कहा…

शुक्ला मेरा नाम बदनाम न करो....हे राम

परछाईयां

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