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रविवार, 20 जनवरी 2013

सैनिटरी पैड और हम





माम लोगों ने अपने हिस्से की रोशनी का इंतजार किया और इंतजार के उस पार अपनी जिंदगी की लौ बुझा दी...ये जानकर कि ऐसा हमेशा नहीं होता कि सबके हिस्से में सूरज आए। लेकिन तुमने साबित किया अपना लोहा और ये भी कि तुम उनमें से नहीं थे। तुमने अपने होने की वजहों के हजारों-लाखों चिराग बनाए और दिन-रात की अथक मेहनत से नया सूरज उगाया। अब सूरज तुम्हारे इशारे पर उगता है...देखता हूं कि कैसे लोग चरागों की शक्ल में तुमसे लिपटते जाते हैं और तुम उनका स्याह लेकर रोशनी की उम्मीद बांटते हो....बिना रुके, बिना थके।

कपड़ों के कितने मतलब होते हैं...किसी के लिए साज-सिंगार तो किसी के लिए अस्मत ढंकने का जरिया...कोई दिन में चार बदले तो किसी के पास चार दिनों के लिए एक। कपड़े वो सब छुपा लेते हैं जिन्हें हम दुनिया के सामने नहीं लाना चाहते, लेकिन यही कपड़े वो सच नहीं छुपा सके जिससे रुबरू होते ही आपकी रूह कांप उठेगी। मुमकिन है थोड़ी देर को नजरें बर्फ हो जाएं, और अंदर कुछ ठहर जाए। मैं सहम गया हूं। देश की हजारों औरतों को बच्चेदानी यानी यूटेरस का कैंसर होता है, या इन्फेक्शन की वजह से इस दुनिया का सृजन करने वाला वो अंग काटकर निकाल दिया जाता है क्योंकि उन हजारों लाखों औरतों के पास मेन्सट्रुएश्नल साइकल बिताने के लिए गज भर का साफ कपड़ा नहीं होता। सैनिटरी पैड की बात कौन करे। साथ ही ये आंकड़ा भी कि वूमन एम्पावरमेंट की बहसों के लिए सरकारों ने सैकड़ों करोड़ फूंक दिए। वूमन एम्पावरमेंट? ? ?

ऐसे में हर महीने के उन तकलीफदेह दिनों को बिताने के लिए देश के मुख्तसर इलाकों में बेइंतहां गरीब तबके की औरतें किन-किन चीजों का इस्तेमाल करती हैं...जरा दिल थामकर सुनिए...पॉलीथीन, अखबार या रद्दी के कागजों की चिंदियां, जूट की बोरी के टुकड़े, नारियल का बूज, गंदे कपड़ों पर राख यानी ऐश, पहले से इस्तेमाल किए जा चुके(कूड़े के ढेर पर फेंके) सैनिटरी पैड्स, पूराने-बेकार हो चुके कपड़े या फिर कुछ नहीं। ये औरतें सेप्टिक हो चुके इस कपड़े को धूप भी नहीं दिखा पातीं, वजह शायद बतानी जरूरी नहीं। नतीजा, यूटरस में होने वाला लाइलाज इन्फेक्शन। कपड़ा, ये एक शब्द कितना बड़ा लगता है।
ऐसे में तुमने उम्मीदों का नया उफक खोला...दुनिया से कहा कि वो कपड़ा जो तुम्हारे लिए बेमतलब हो चुका है उसे दान कर दो। रिसाइक्लिंग की, रेनोवेट किया और मुफ्त की सैनिटरी पैड बनाई, उन लोगों के लिए जहां वूमनहुड एक अभिशाप से ज्यादा कुछ नहीं। धीरे-धीरे इसे एक उद्यम में बदला। सोशल आंत्रेप्रेन्योरशिप के एक उम्दा मॉडल में। गरीब को सम्मान मिला, बदलाव की किरण दिखी और दे सकने वालों को एक वजह। एक कारण। सार्थकता का बहुमूल्य भाव। संतोष।

गूंज, जो संस्था तुम चलाते हो वो आज हर साल एक हजार टन से ज्यादा पुराने कपड़ों को इकट्ठा करती है, रीसाइकल करती है और गरीब तबके की उन औरतों के लिए सैनिटरी पैड रीप्रड्यूस करती है जो उन्हें नई जिंदगी दे रहा है। हिंदुस्तान के 21 राज्यों में गूंज की गूंज सुनाई देती है...छोटे-मोटे करीब 200 गैरसरकारी संस्थाओं, इतने ही बिजनेस हाउस, 100 स्कूल और 500 से ज्यादा स्वयंसेवी क्लॉथ फॉर वर्क की इस अनूठी योजना को अमली जामा पहना रहे हैं...वो भी कुल जमा 97 पैसे प्रतिकिलोग्राम के खर्च पर।

इस शख्स का नाम अंशु गुप्ता है। अंशु की उम्र ज्यादा नहीं लेकिन हौसले आसमान छूते हैं। मैंने अंशु को कहीं बोलते सुना...पांच मिनट में जो सुना और फिर पढ़ा, ये पोस्ट उसी का सार है। पहले अंशु ने कहा कि वो सैनिटरी पैड पर काम करते हैं। पहले मैं भी अचकचाया था, आप ही की तरह। लेकिन उन पांच मिनटों में बहुत कुछ बदला। अब ये शब्द बोलने में संकोच का भाव नहीं आता। अगर आपको आता हो तो गूंज के बारे में डब्लूडब्लूडब्लू डॉट गूंज डॉट कॉम पर जाकर पढ़ें। और ये भी कैसे उनके बीस लाख से ज्यादा सैनिटरी पैड्स ने हजारों लाखों औरतों की जिंदगियां बदली हैं।

ये लिखते हुए बालकनी से सूरज को डूबते देखता हूं और अचानक फिर से सोचता हूं, जीने की वजह के बारे में। अब वो हर जगह दिखाई देती है। चमकती सी। रोशनी की गूंज सी...तुम भी आसपास ही हो कहीं और खुश भी। कितना कुछ तो है...कितना-कुछ, खत्म होने के बाद भी।

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to know more about him, google Asnhu gupta.

Image courtesy-  .ecell-nitt.org

10 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गूँज निसन्हेद सुनायी पड़ेगी, एक न एक दिन..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

*निसन्देह

kanupriya ने कहा…

maanti hu kapda shabd chota hai jarurat badi...behtareen post aur usse jyada behtareen is nayab aadmi ke baare me jaanna.thanks,ja rahi hu goonj ki site dekhne

Ajay Singhal ने कहा…

We are happy that goonj is helping our school too

Kanchan Bansal ने कहा…

Anshu....u r really great!!! i am short of words to praise u...

varsha ने कहा…

shukriya, behad zaroori post.

varsha ने कहा…

gar ijazat ho to aapke is lekh ko akhbaar mein prakashan ke liye lena chahti hoon.

vivek shukla ने कहा…

ज़रूर वर्षा जी। धन्यवाद आपका।

नीलम ने कहा…

Karwa Sach.

smita mital ने कहा…

jahaan humaari soch bhi nahi jaati wahaan zindagi di hai, jin kaano mein awaaz sunai nahi deti wahaan goonj ne halla kar diya hai ! Salaam hai aap logon ko.

परछाईयां

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