पहला हस्ताक्षर...

कुछ-कुछ पहले जैसा...

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

मुक्ति

मुक्ति...

मुझे मुक्ति चाहिए
इस भय से
इस असुरक्षा से...
सोचता हूं,
कि क्या होगा,
मेरी सांसों की आवाजाही का
आधार,
यदि नहीं मिली तुम
?
लेकिन ठहरो।
रुको।
इस भय के भी,
सिक्के की तरह दो पहलू हैं
सोचता हूं,
कि क्या होगा,
यदि मिल गयी तुम
?
क्या होगा
,
यदि मिल गयी तुम...

7 टिप्‍पणियां:

Smriti Sinha ने कहा…

मुक्ति...

यदि मिल गयी तो...

होगा ये कि बंधन की घुटन में साँसे लेना चाहोगे...


पूजा के माध्यम से आपके ब्लॉग तक पहुंची.

बेहद सुंदर कविता.

Puja Upadhyay ने कहा…

शाश्वत प्रश्न है विवेक...मन ऐसा बावरा है कि हमेशा 'काश' के महीन धागे पर पूरे जीवन का ताना बाना बुन लेता है.

सच मगर ये है कि वो 'तुम' जो तुम्हारी आत्मा का अंश है, मिल जाता है न तो वाकई मुक्ति मिल जायेगी सवालों के इस चक्रव्यूह से. उस 'तुम' को पहचान लेना मगर. उसकी आँखों में देखोगे तो अपनी रूह का अक्स दिखेगा.

हस्तक्षेप ने कहा…

शुक्रिया पूजा, अपनी रूह की झलक किसी और में देखने के ख्याल से डर ज्यादा लगता है, रोमांच कम। आपका भी शुक्रिया स्मृति, पूजा के जरिए ही सही, एकबार घर आना तो हुआ। क्या कहूं...मुझे लगता है ये घुटन ही रास्ता है मुक्ति का...क्योंकि मुक्ति तो अपने आप में ही एक आदर्श स्थिति है जिसकी अनुभूति के बाद किसी तरह की घुटन या बंधन का बोध बचता ही नहीं..जिस दिन ये घुटन में ही मुक्ति पाने का ये बोध पक्का हो गया, गहरा हो गया, उस दिन कविता में दुख नहीं होगा...फूल होंगे...रंगीन, पीले, नीले, खुशबूदार...

दर्पण साह ने कहा…

क्या होगा
,
यदि मिल गयी तुम...

Answer: Kasap !

हस्तक्षेप ने कहा…

कसप...हर प्रेम कथा का अंत ऐसा क्यूं होता है..बेबी का अल्हड़पन और डी डी का डरपोक प्यार..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

न पाने से अधिक कष्टकारी है पा कर न सहेज पाना। बहुत अच्छी।

अनुपमा पाठक ने कहा…

न पाना तो भयावह है ही... पा लेने पर भी भय से मुक्ति नहीं!
अजीब ही है जीवन....

परछाईयां

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