पहला हस्ताक्षर...

कुछ-कुछ पहले जैसा...

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

क्यों बरस रही हो...बेमौसम?






जाने इस बारिश से कैसा नाता है...बिन पूछे, बिन बताए चली आती है...कभी आंखों में...कभी बरामदे में..चाहे मौसम भी हो या नहीं। पूछूं तो कहती है...किसी की याद में आंखे भर आने और खुश से आंखे भर जाने का भी कोई मुहूर्त होता है भला...

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आंखें जल रही थीं
सुबह से ही आज,
गला भी रुंधा है जैसे,
जाने क्या, जाने कहां अटका है...
तुम्हारी गहराती यादों की धुंधलकी खोह में,
ढूंढ़ने से नहीं मिलता...
कोई सिरा...तुम्हारी छुअन का कोई एहसास..
उस पर ये बारिश...

एक चमकीले पीले फूल की तरह,
अभी-अभी शुरु हुआ था दिन
और बिना बात की, नवंबर की ये बारिश...?


जैसे फिर नाराज हो गयी तुम,
और सोच रहा हूं, अभी तो ठीक था सबकुछ..
फिर अचानक?
धीरे-धीरे इस बारिश में मिल गयी है जैसे...
नमी मेरे अंतस की...फैलकर
और बरसने लगी है बेबस आंखों की तरह,
जिनका दुख किसी ने जबरन बांध रखा है,
दिनों-महीनों-सालों से...
क्या कभी दुख की शक्ल,
बादलों से मिलती-जुलती है?

बरामदे से देखता
इस दुख की शक्ल पहचानने की
कोशिश कर रहा हूं मैं...
नया ही कोई रचा है मैंने,
या पिछली बारिशों का ही कोई टुकड़ा है
जो मेरी आंखों की पोरों में,
अटका रह गया था कहीं,
चुभ रहा था अब तक..
और खुल कर बरस रहा है अब.

यूं बरामदे से,
शक्ल ना बादल की दिखती है
ना अब बारिश का चेहरा ही तुमसे मिलता है
पर ये दुख...
बारिश के साथ बरसती ये चुभन,
छाती में कसकती ये जलन...
जानी पहचानी लगती है।
ना जाने किससे,
पर,
इस दुख की शक्ल,
किसी से तो मिलती-जुलती है...

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अहा..

हस्तक्षेप ने कहा…

मेरे तो अश्क भी औरों के काम आते हैं,
मैं रो पडूं तो कई लोग मुस्कुराते हैं...
;)
शुक्रिया प्रवीण भाई.

Puja Upadhyay ने कहा…

अब तक जो भी तुमने लिखा है...उसमें ये मेरी सबसे पसंदीदा.

बंगलोर की बारिश में जब बालकनी में खड़ी रहूंगी, तो तुम्हारी इस बारिश के रंग याद आयेंगे अब...

इस बारिश का राग कितना खूबसूरत है, धुंधलाते कांच के पार दिखती ये बारिश. कितनी यादें जिन्दा कर गयी. इतना खूबसूरत लिखा है कि तारीफ को शब्द नहीं मिल रहे.

परछाईयां

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